21 जून यानि रविवार को आषाढ कृष्ण पक्ष की अमावस्या को चूड़ामणि सूर्यग्रहण होगा। जोकि भारत में दिखाई देगा। ग्रहण से लगने वाला सूतक शनिवार रात 10.24 बजे लग जाएगा औऱ सूर्यग्रहण रविवार प्रातः 10.24 बजेे से लेकर दोपहर 1.48 बजे करीब 3.24 घंटे तक रहेगा। सूर्यग्रहण का सूतक ग्रहण से करीब 12 घंटे पहले शुरु हो जाता है। सूतक में बालक, वृद्ध और अस्वस्थ लोगों को छोड़कर शेष सभी को भोजन व नींद लेना निषेध होता है।

एस्ट्रो बद्री के संस्थापक व अरिंहत अंबर सोसायटी के निवासी पंड़ित पुरुषोतम सती का कहना है कि यह एक खगोलीय घटना है। इसको धर्म व विज्ञान ने अपनी मान्यताएं दी है। ग्रहण के  समय कुछ सावधानियों का पालन करना चाहिए। जैसे भोजन नहीं करना औऱ नींद नहीं लेना। खासकर ग्रहण के समय गर्भवती महिलाओं का इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।

ग्रहण का स्पर्श- प्रातः 10 बजकर 24 मिनट
ग्रहण का मध्य समय – दोपहर 12 बजकर 5 मिनट
ग्रहण का मोक्ष – समय दोपहर 1 बजकर 48 मिनट होगा
सम्पूर्ण ग्रहण का काल -3 घण्टे 24 मिनट
नोएडा में ग्रहण का समय – 10 बजकर 19 मिनट से दोपहर 1 बजकर 45 मिनट तक

सूर्य ग्रहण मृगशिरा नक्षत्र व मिथुन राशि में घटित होगा।

चूड़ामणि योग:
रविवार को सूर्यग्रहण हो तो उसे चूड़ामणि सूर्यग्रहण कहा जाता है। स्नान- दान- जप- हवन आदि के लिए चूड़ामणि सूर्यग्रहण का माहात्म्य अन्य सामान्य ग्रहण से करोड़ों गुना अधिक माना जाता है।

वारेष्वन्येषु यत्पुण्यं ग्रहण चंद्र-सूर्य। तत्पुण्यं कोटिगुणितं योग चूड़ामणी स्मृतम् ॥ (व्यास)

ग्रहण माहात्म्य
ग्रहण के समय गंगा आदि पवित्र नदियों, सरावरों, स्रोतों तथा सागर में स्नान का विशेष माहात्मय है।
मत्स्यपुराण में कहा गया है कि सूर्यग्रहण के समय गंगा कनखल, प्रयाग, पुष्कर और कुरुक्षेत्र में स्नान से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

गंगा कनखलं पुण्यं प्रयागः पुष्करं तथा। कुरुक्षेत्र तथा पुण्यं राहुग्रस्ते दिवाकरे॥

इन तीर्थो पर ग्रहण के समय स्नान के साथ दान, जप, हवन इत्यादि भी करना चाहिए –
“सूर्येन्दु ग्रहणं यावत्तावत् कुर्याज्जपादिकम्”

ग्रहणकाल प्रारम्भ होते ही स्नान करे, दान-होम करना चाहिये। ग्रहण में दान किया जाता।
पर्वकाल समाप्त हाने पर सचैल स्नान का विधान है-
‘स्नानं सवसनं ग्रहे किया जाता है। स्मात ग्रस्यमाने भवेत्स्नानं ग्रस्ते होमो विधीयते। मुच्यमाने भवेद्दानं मुक्तौ स्नानं विधीयते॥

ग्रहण के समय एवं ग्रहण की समाप्ति पर गर्म पानी से स्नान करना निषिद्ध है-
मृते जन्मनि संक्रान्तौ ग्रहणे चन्द्र सूर्ययोः। अस्पृश्य स्पर्शने चैव स्नायादुष्णवारिणा॥
यह निषेध रोगियों के लिये नहीं है।

ग्रहण काल में दूषित-अदूषित भोजन:
पका हुआ अन्न, कटी हुई सब्जी और फल ग्रहणकाल में दूषित हो जाते हैं उन्हें नहीं खाना चाहिये लेकिन तेल या घी में पका हुआ (तला हुआ) अन्न, घी, तेल, लस्सी, मक्खन, पनीर, अचार, चटनी, मुरब्बा में तिल या कुशा रख देने से ये दूषित नहीं होते। सूखे खाद्य पदार्थो में तिल या कुशा डालने की जरुरत नहीं है।

“वारि-तक्रार काला तिल-दर्भैर्न दुष्यति”
ग्रहण के मोक्ष के बाद स्नान करके ही भोजन ग्रहण करना चाहिये।
ग्रहण मोक्ष के बाद खाया जाने वाला भोजन परान्न( दूसरे का अन्न) ना हो यह भी धर्मशास्त्र का निर्देश है-
“पश्चाद् भुंज्यात्स्ववेश्मनि”