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वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ खोले गए भगवान बदरी विशाल धाम के कपाट, मुख्य पुजारी रावल समेत 27 लोग ही रहे मौजूद

उत्तराखंड। बदरीनाथ धाम में मंदिर के कपाट आज सुबह 4 बजकर 30 मिनट पर वेद मंत्रों की ध्वनि के साथ खोल दिए गए। कपाट खोले जाने से पूर्व भगवान बदरी विशाल के मंदिर को 10 क्विंटल फूलों से सजाया गया था। कपाट खोलने के दौरान वहां पर सोशल डिसटेंसिंग का पालन करते हुए मुख्य पुजारी रावल के साथ 27 लोग ही मौजूद थे। ऐसा पहला मौका है जब कपाट खुलने के दौरान इतनी सीमित संख्या में लोग मौजूद रहे हैं। इस अवसर पर रावल, धर्माधिकारी, अपर धर्माधिकारी, सीमित संख्या में ही  हक हकूकधारी और देवस्थानम बोर्ड के अधिकारी, कर्मचारी मौजूद रहे। वहीं मंदिर के आस पास के क्षेत्र को कपाट खुलने से पूर्व और बाद तक भी लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है।

धनिष्ठा नक्षत्र में खुले कपाट

बदरीनाथ मंदिर के कपाट आज सुबह 4: 30 बजे धनिष्ठा नक्षत्र पर खुले। बदरीनाथ मंदिर के धर्माधिकारी पंडित भुवन चंद्र उनियाल ने जानकारी देते हुये बताया मेष लग्न और कुभ्म की चंद्रमा के शुभ मुहूर्त पर भगवान के द्वार खोले गए। इस दौरान सबसे पहले बदरीनाथ मंदिर के सिंहद्वार के द्वार खोले गए। वेद मंत्रों की ध्वनि के साथ कपाट खोले जाने की पूरी परंपरा को निभाया गया। द्वार के ताले की चाबी देवस्थानम बोर्ड के द्वारा खोली गई। जिसके बाद मंदिर के गर्भ गृह के द्वार के कपाट खुले। इसके ताले की अलग चाबियां थीं। जिनमें से एक देवस्थानम बोर्ड और परम्परागत रूप से हक हकूक धारियों के द्वारा खोली गई।

रावल ईश्वरी प्रसाद ने किया गर्भ गृह में सबसे पहले प्रवेश

भगवान बदरी विशाल के गर्भ गृह के द्वार खुलते ही सबसे पहले बदरीनाथ के रावल  ईश्वरी प्रसाद नम्बूदरी ने गर्भ गृह में प्रवेश किया। जिन्होंने ने सबसे पहले भगवान को ओढाए गए ऊनी घृत कंबल को निकाला। यह ऊनी घृत कंबल भगवान बदरी विशाल को शीतकाल ओढ़ाया गया था। रावल जी द्वारा श्रद्धा पूर्वक उसे निकाला गया। जिसके बाद उन्होंने  ध्यानावस्था में बैठे भगवान बदरी विशाल के निर्वाण दर्शन किए। इस अवसर पर सभा मंडप में धर्माधिकारी और अपर धर्माधिकारी वेद पाठी मंत्रोच्चार करते रहे। वहीं रावल ईश्वरी प्रसाद नम्बूदरी ने पवित्र जलों से भगवान का स्नान और भव्य अभिषेक कराया।

निभाई गईं परंपराएं

बदरीनाथ में आस्था के साथ लोक मान्यताओं का भी निर्वहन होता है। कपाट बंद होने पर लक्ष्मी जी का जो विग्रह भगवान बदरी विशाल के सानिध्य में रखा जाता है। कपाट खुलने पर लक्ष्मी जी को बदरीनाथ मंदिर के निकट लक्ष्मी मंदिर में पहले लाया जाता है। तब उद्धव जी का विग्रह जो पांडुकेश्वर योग ध्यान मंदिर से लाया जाता है उन उद्वव जी को भगवान के सानिध्य में रखा जाता है। उद्धव श्री कृष्ण के सखा स्वरूप हैं पर उम्र में कृष्ण से बड़े हैं। इसलिये लोक परम्परा में वे लक्ष्मी जी के जेठ हुये। हिन्दू परम्परा में जेठ के सामने बहू नहीं सकतीं। इसलिये पहले लक्ष्मी जी लक्ष्मी मंदिर लाईं गईं और उसके बाद उद्धव जी भगवान के सानिध्य में विराजित हुए। कपाट खुलने पर भगवान बदरी विशाल के सानिध्य में देवताओं के खंजाची धन कुबेर महाराज भी विराजमान हुए। पांडुकेश्वर के कुबेर मंदिर से भगवान कुबेर की सुन्दर स्वर्ण प्रतिमा पालकी में सजा कर लाईं गईं। इस तरह बदरीनाथ के कपाट खुलते ही यहां स्थित सभी मंदिरों में पूजा अर्चना शुरू हो गई।

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